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राज्य गठन के 25 साल बाद भी गैरसैंण नहीं पहुंचे सरकारी मुख्यालय

राज्य गठन के 25 साल बाद भी गैरसैंण नहीं पहुंचे सरकारी मुख्यालय

देहरादून | उत्तराखंड राज्य गठन के लगभग 25 वर्ष बीत जाने के बाद भी अधिकांश सरकारी विभागों के मुख्यालय गैरसैंण में स्थापित नहीं हो सके हैं। राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी के रूप में घोषित Gairsain अब भी सरकारी संस्थानों और विभागीय मुख्यालयों की प्रतीक्षा कर रही है, जबकि अधिकतर विभागों का संचालन अभी भी Dehradun और Nainital से ही किया जा रहा है।

लोकप्रिय लोकगायक Narendra Singh Negi के गीत “सबि धाणी देहरादून, होणी खाणी देहरादून” की पंक्तियां राज्य के प्रशासनिक ढांचे पर सटीक बैठती नजर आती हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि उत्तराखंड के 204 सरकारी विभागों के मुख्यालय देहरादून में ही स्थित हैं, जबकि 22 मुख्यालय नैनीताल में हैं। इसके विपरीत कई पर्वतीय जिलों में आज तक किसी भी विभाग का मुख्यालय स्थापित नहीं किया गया है।

गैरसैंण को बनाया गया था ग्रीष्मकालीन राजधानी

उत्तराखंड सरकार ने वर्ष 2020 में गैरसैंण को राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया था। उस समय यह भी घोषणा की गई थी कि राज्य के विभिन्न संस्थानों और विभागों के मुख्यालय धीरे-धीरे यहां स्थापित किए जाएंगे, ताकि पर्वतीय क्षेत्रों का विकास हो सके और प्रशासनिक संतुलन बनाया जा सके।

इसी क्रम में उस समय की सरकार ने गैरसैंण में भाषा संस्थान का मुख्यालय स्थापित करने की भी घोषणा की थी। उम्मीद जताई गई थी कि इस पहल के बाद अन्य संस्थान और सरकारी कार्यालय भी धीरे-धीरे गैरसैंण में स्थापित होंगे।

भाषा संस्थान को भी नहीं मिला स्थायी मुख्यालय

प्रदेश में स्थानीय बोलियों और भाषाओं को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उत्तराखंड भाषा संस्थान की स्थापना की गई थी। लेकिन स्थापना के कई वर्षों बाद भी इस संस्थान को स्थायी मुख्यालय नहीं मिल सका है।

दिलचस्प बात यह है कि गैरसैंण में मुख्यालय स्थापित करने की घोषणा के बावजूद अब इसके लिए देहरादून में ही जमीन तलाशने की प्रक्रिया चल रही है। इससे यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या वास्तव में सरकारी संस्थानों को गैरसैंण या अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में स्थानांतरित करने की योजना पर गंभीरता से काम किया जा रहा है या नहीं।

पहाड़ी जिलों में एक भी मुख्यालय नहीं

सामाजिक कार्यकर्ता एसपी नौटियाल का कहना है कि राज्य में सरकारी मुख्यालयों का अत्यधिक केंद्रीकरण हो गया है। उनके अनुसार रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़, बागेश्वर और चंपावत जैसे कई पर्वतीय जिलों में आज तक किसी भी विभाग का मुख्यालय स्थापित नहीं किया गया है।

उनका कहना है कि कुल 265 विभागीय मुख्यालयों में से लगभग 77 प्रतिशत देहरादून में ही स्थित हैं। इससे प्रशासनिक व्यवस्था का संतुलन बिगड़ता है और पहाड़ी क्षेत्रों के विकास पर भी असर पड़ता है।

विकेंद्रीकरण की उठ रही मांग

सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों का मानना है कि राज्य सरकार को विभागीय मुख्यालयों का विकेंद्रीकरण करना चाहिए। इससे प्रशासनिक व्यवस्था अधिक संतुलित होगी और पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार तथा बुनियादी ढांचे के विकास को भी बढ़ावा मिलेगा।

इसके अलावा, ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण में भी कुछ प्रमुख विभागों के मुख्यालय स्थापित किए जाने चाहिए, ताकि इस क्षेत्र को वास्तविक रूप से प्रशासनिक महत्व मिल सके।

फिलहाल, राज्य गठन के ढाई दशक बाद भी अधिकांश सरकारी विभागों का संचालन देहरादून और नैनीताल से ही हो रहा है। ऐसे में गैरसैंण को प्रशासनिक रूप से सशक्त बनाने की मांग समय-समय पर उठती रही है, लेकिन इस दिशा में ठोस कदम अभी भी अपेक्षित हैं।

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