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नौ महीने में मानव-वन्यजीव संघर्ष की 462 घटनाएं, तेंदुए सबसे घातक

नौ महीने में मानव-वन्यजीव संघर्ष की 462 घटनाएं, तेंदुए सबसे घातक

देहरादून। उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं लगातार चुनौती बनी हुई हैं। जनवरी से सितंबर 2026 तक प्रदेश में वन्यजीवों के हमलों की 462 घटनाएं दर्ज की गईं। इन घटनाओं में 55 लोगों की मौत हुई, जबकि 407 लोग घायल हुए। वन्यजीवों के हमलों में तेंदुए, बाघ और भालू के साथ सांप के काटने की घटनाएं भी शामिल हैं।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, तेंदुए के हमलों में सबसे अधिक 17 लोगों की मौत हुई और 75 लोग घायल हुए। बाघ के हमलों में 12 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें चार लोगों की जान गई। वहीं, भालू के हमलों में चार लोगों की मौत हुई और 40 लोग घायल हुए। सांप के काटने से भी जनहानि हुई। इस अवधि में सर्पदंश से 10 लोगों की मौत और 102 लोग घायल हुए।

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स्थानीय लोगों की मदद से जुटाई जा रही सूचनाएं

मुख्य वन संरक्षक गढ़वाल धीरज पांडे के अनुसार, मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में कमी लाने के लिए स्थानीय लोगों का सहयोग लिया जा रहा है। ऐसी घटनाओं को रोकने में समय पर सूचना मिलना महत्वपूर्ण है। इसके लिए क्षेत्रीय स्तर पर बैठकें की जा रही हैं और सोशल मीडिया समूह बनाए गए हैं।

स्वरोजगार एवं उद्यमिता योजनाएँ

इन समूहों में वन विभाग, राजस्व विभाग और स्थानीय लोगों को शामिल किया गया है, ताकि किसी क्षेत्र में वन्यजीव की गतिविधि या हमले की आशंका की जानकारी जल्द मिल सके। संवेदनशील स्थानों को चिह्नित कर वहां वन विभाग की टीमों को तैनात किया गया है। साथ ही गश्त भी बढ़ाई गई है।

एआई कैमरों से भी रखी जा रही नजर

वन विभाग संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी के लिए एआई कैमरों का भी इस्तेमाल कर रहा है। वन संरक्षक आकाश वर्मा के अनुसार, उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करते हुए मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं को कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

बदरीनाथ, रुद्रप्रयाग और पौड़ी वन प्रभाग के कई संवेदनशील स्थानों को चिह्नित किया गया है। इन क्षेत्रों में सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं। वन विभाग की ओर से सोलर लाइट लगाने और एनाइडर जैसे उपकरणों का उपयोग करने का काम भी किया गया है। इसके अलावा, प्रभावी निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था के लिए अतिरिक्त संसाधनों की मांग की गई है।

वन विभाग का प्रयास है कि स्थानीय स्तर पर सूचना तंत्र मजबूत हो और संवेदनशील इलाकों में समय रहते जरूरी कदम उठाए जा सकें, ताकि वन्यजीवों और लोगों के बीच टकराव की घटनाओं में कमी लाई जा सके।

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