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हिमालय में तेजी से बदल रहा प्रकृति का दायरा: 32 वर्षों में 520 मीटर ऊपर खिसकी हिमरेखा, वनस्पति सीमा में भी बड़ा बदलाव

हिमालय में तेजी से बदल रहा प्रकृति का दायरा: 32 वर्षों में 520 मीटर ऊपर खिसकी हिमरेखा, वनस्पति सीमा में भी बड़ा बदलाव

मुनस्यारी (पिथौरागढ़)। जलवायु परिवर्तन का असर अब हिमालय की ऊंची चोटियों और संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र में साफ दिखाई देने लगा है। बढ़ते तापमान के कारण हिमरेखा और वनस्पतियों की सीमाएं लगातार ऊंचाई की ओर खिसक रही हैं। कुमाऊं विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के एक अध्ययन में गोरी गंगा वाटरशेड में पिछले 32 वर्षों के दौरान प्रकृति के दायरे में बड़े बदलाव सामने आए हैं। लैंडसैट उपग्रहों से प्राप्त आंकड़ों पर आधारित यह शोध स्प्रिंगर नेचर में प्रकाशित हुआ है।

गोरी गंगा वाटरशेड उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले की मुनस्यारी तहसील में स्थित है और करीब 2,191.63 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। कुमाऊं विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के शोधकर्ता डीएस परिहार और कपकोट महाविद्यालय के भूविज्ञान विभाग में प्राध्यापक डॉ. निर्मित साह ने वर्ष 1990 से 2022 तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया।

हर दिशा से जुड़ रहा "उत्तराखण्ड"

शोध में लैंडसैट-5 और लैंडसैट-8 उपग्रहों के आंकड़ों का उपयोग किया गया। अध्ययन के अनुसार, वर्ष 1990 में गोरी गंगा वाटरशेड की औसत हिमरेखा 4,665.02 मीटर की ऊंचाई पर थी, जो वर्ष 2022 में बढ़कर 5,185.47 मीटर पहुंच गई। यानी 32 वर्षों में हिमरेखा 520.45 मीटर ऊपर खिसक गई। इसकी औसत वार्षिक दर 16.26 मीटर दर्ज की गई।

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वनस्पति और पेड़ों की सीमाओं में भी बड़ा बदलाव

अध्ययन में वनस्पति की ऊपरी सीमा में भी उल्लेखनीय बदलाव सामने आया है। वर्ष 1990 में वनस्पति रेखा 4,294.97 मीटर पर थी, जो 2022 में बढ़कर 4,890.67 मीटर हो गई। इस दौरान वनस्पति सीमा 595.7 मीटर ऊपर खिसकी।

इसी तरह वनों और पेड़ों की ऊपरी सीमा वर्ष 1990 में 3,516.11 मीटर थी, जो 2022 में बढ़कर 4,196.01 मीटर तक पहुंच गई। यानी इसमें 679.9 मीटर का बदलाव दर्ज किया गया। यह औसतन 21.25 मीटर प्रतिवर्ष की दर से ऊपर की ओर बढ़ी है।

पारिस्थितिकी तंत्र और स्थानीय आजीविका पर पड़ रहा असर

शोधकर्ताओं के मुताबिक, गोरी गंगा घाटी में बर्फ की मात्रा कम होने, सर्दियों के मौसम के पैटर्न में बदलाव और तापमान बढ़ने से स्थानीय पेड़-पौधों, कीटों और जीव-जंतुओं के मौसमी चक्र प्रभावित हो रहे हैं। इसका असर क्षेत्र की जैव विविधता पर भी पड़ रहा है।

इसके अलावा कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में नींबू वर्गीय फलों की खेती का क्षेत्र भी धीरे-धीरे ऊंचाई की ओर खिसक रहा है। इससे स्थानीय कृषि व्यवस्था और लोगों की आजीविका के स्वरूप में बदलाव आने की आशंका है।

अनियोजित विकास से बढ़ रही पर्यावरणीय चुनौतियां

अध्ययन में वर्ष 1950 के बाद पहाड़ी क्षेत्रों में बढ़ी अनियोजित विकास गतिविधियों और मानवीय हस्तक्षेप को क्षेत्रीय जलवायु संतुलन प्रभावित करने वाले कारकों के रूप में रेखांकित किया गया है। बादल फटना, अत्यधिक बारिश, झीलों और गधेरों का सूखना तथा सर्दियों में सूखे जैसी चरम मौसमी घटनाएं भी चिंता का विषय हैं।

शोधकर्ता डॉ. निर्मित साह के अनुसार, तापमान में वृद्धि के कारण हिमालयी क्षेत्रों में हिमरेखा और वनस्पतियों की सीमाएं लगातार ऊपर की ओर खिसक रही हैं। गोरी गंगा घाटी में बर्फ की मात्रा कम होने और सर्दियों के मौसम के पैटर्न में बदलाव से प्राकृतिक मौसमी चक्र प्रभावित हो रहा है।

उन्होंने हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी को सुरक्षित रखने के लिए पर्यावरण के अनुकूल विकास रणनीतियां अपनाने और पहाड़ी क्षेत्रों में अनियोजित शहरीकरण पर सख्त निगरानी रखने की आवश्यकता जताई है।

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