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भरसार विश्वविद्यालय में दो पत्रों से उठे सवाल: 10 दिन में अधिकारी की मानसिक स्थिति पर बदल गया आकलन

भरसार विश्वविद्यालय में दो पत्रों से उठे सवाल: 10 दिन में अधिकारी की मानसिक स्थिति पर बदल गया आकलन

देहरादून। वीरचंद्र सिंह गढ़वाली उत्तराखंड औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, भरसार में सहायक कुलसचिव के पद पर प्रतिनियुक्ति पर तैनात धीरज उपाध्याय को लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन के दो पत्रों से सवाल खड़े हो गए हैं। महज 10 दिन के अंतराल में भेजे गए दो पत्रों में उनके संबंध में बिल्कुल अलग-अलग आकलन सामने आया है।

शिकायत के अनुसार, 11 जुलाई 2025 को त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के दौरान विश्वविद्यालय ने निर्वाचन अधिकारी को पत्र भेजकर धीरज उपाध्याय की चुनाव ड्यूटी निरस्त करने का अनुरोध किया था। पत्र में उनकी मानसिक स्थिति अत्यधिक खराब होने और देहरादून के इंद्रेश अस्पताल में उपचार चलने का उल्लेख किया गया था।

इसके ठीक 10 दिन बाद, 21 जुलाई 2025 को विश्वविद्यालय प्रशासन ने शासन को पत्र भेजकर धीरज उपाध्याय को विश्वविद्यालय में ही पूर्ण रूप से सेवायोजित करने की मांग की। इस पत्र में उन्हें प्रशासनिक, वित्तीय और अकादमिक कार्यों के कुशल संचालन में सक्षम तथा नियमों और बजट की अच्छी जानकारी रखने वाला अधिकारी बताया गया।

दोनों पत्रों में सामने आए विरोधाभास को लेकर शिकायतकर्ता ने सवाल उठाते हुए मामले की जांच की मांग की है। शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि अधिकारी की मानसिक स्थिति इतनी खराब थी कि उनकी चुनाव ड्यूटी निरस्त करने की सिफारिश की गई, तो महज दस दिन बाद उन्हें महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारियों के लिए उपयुक्त कैसे माना गया।

प्रतिनियुक्ति अवधि पूरी होने के बाद भी नहीं हुई वापसी

धीरज उपाध्याय की मूल तैनाती उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय में वरिष्ठ सहायक के पद पर बताई गई है। शिकायत के मुताबिक, भरसार विश्वविद्यालय में उनकी प्रतिनियुक्ति अवधि 17 अप्रैल 2025 को समाप्त हो गई थी। इसके बावजूद उन्हें मूल विभाग में वापस नहीं भेजा गया।

इस मामले में अगस्त 2025 में शासन को शिकायत भी भेजी गई थी।

उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. एसके बरनवाल ने बताया कि धीरज उपाध्याय की प्रतिनियुक्ति अवधि पूरी हो चुकी है। उन्हें मूल तैनाती स्थल पर वापस भेजने के लिए भरसार विश्वविद्यालय प्रशासन को कई बार पत्र भेजे जा चुके हैं, लेकिन अभी तक उन्हें वापस नहीं भेजा गया है।

मामले में अब दोनों पत्रों में दर्ज तथ्यों और अधिकारी की प्रतिनियुक्ति जारी रहने के कारणों को लेकर जांच की मांग उठ रही है।

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